₹1200 के किराए वाले घर से 5.20 करोड़ तक का सफर, पिता बोले– भारतीय टीम में खेले तभी सपना पूरा होगा
मध्यप्रदेश के पांढुर्णा जिले से करीब 35 किलोमीटर दूर बोरगांव गांव। संकरी गलियां, सीमित साधन और संघर्ष से भरा जीवन। इसी गांव की एक तंग गली में 10×10 के छोटे से किराए के कमरे में रहने वाला 23 वर्षीय मंगेश यादव आज पूरे इलाके की पहचान बन गया है। IPL 2026 की नीलामी में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने उन्हें 5.20 करोड़ रुपए में खरीदा है।
मंगेश की कहानी केवल क्रिकेट की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है, जिसमें सपनों को जिंदा रखने के लिए हालात से रोज लड़ना पड़ता है।

1200 रुपए किराया, एक ही कमरे में छह लोगों का जीवन
मंगेश का घर एक कमरे और उससे लगी छोटी सी रसोई तक सीमित है। इसी कमरे में उनका सोना, खाना और रहना होता है। परिवार में माता-पिता और तीन बहनें हैं। जगह इतनी कम है कि किसी मेहमान के बैठने के लिए कुर्सी रखने की भी गुंजाइश नहीं बचती।
घर का किराया सिर्फ ₹1200 है। बिजली का बिल अलग से। इसी सीमित आमदनी में पूरा परिवार गुजर-बसर करता रहा, लेकिन कभी हालात को मंगेश के सपनों पर हावी नहीं होने दिया।
बेस प्राइस 30 लाख, बोली लगी 5.20 करोड़ की
14 दिसंबर को घरेलू क्रिकेट में डेब्यू करने वाले मंगेश यादव IPL ऑक्शन में चर्चा का बड़ा नाम बने। उनकी बेस प्राइस 30 लाख रुपए थी, लेकिन बोली बढ़ते-बढ़ते 5.20 करोड़ तक पहुंच गई। यानी साढ़े 17 गुना ज्यादा कीमत।
जैसे ही ऑक्शन की खबर गांव पहुंची, सुबह से ही बधाई देने वालों का तांता लग गया। घर के बाहर जूते-चप्पलों की कतारें बता रही थीं कि यह अब सिर्फ एक कमरा नहीं, बल्कि उम्मीदों का केंद्र बन चुका है।
दीवारों पर मेडल, अलमारी में ट्रॉफियां
छोटे से कमरे की दीवारों पर टंगे मेडल और अलमारी में रखी ट्रॉफियां मंगेश की मेहनत की कहानी खुद बयां करती हैं। बहनों और मां ने इन्हें सहेजकर रखा है। आसपास के लोग, रिश्तेदार और पड़ोसी खुशी में मिठाइयां लेकर पहुंच रहे थे। ठंड के मौसम में आने-जाने वालों के लिए चाय की बड़ी भगोनी लगातार चूल्हे पर चढ़ी रहती थी।

पिता की आंखें भर आईं
मंगेश के पिता राम अवध यादव पेशे से ड्राइवर हैं। वे कहते हैं—
“मंगलवार रात करीब साढ़े नौ बजे उसका फोन आया। रो रहा था। बोल भी नहीं पा रहा था। बस इतना कहा कि सेलेक्ट हो गया हूं। उस वक्त हमें लगा कि इतने साल की मेहनत रंग लाई है।”
पिता 22 साल से ड्राइवरी कर रहे हैं। कभी ₹1000 से नौकरी शुरू की थी। आज भी महीने की आमदनी सीमित है। इसके बावजूद उन्होंने बेटे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया। मंगेश 12वीं तक पढ़ा, फिर पढ़ाई छोड़कर क्रिकेट को अपना सबकुछ बना लिया।
पिता साफ कहते हैं—
“पैसा आ गया, लेकिन सपना अभी पूरा नहीं हुआ। वो दिन देखना है जब मेरा बेटा भारत की जर्सी पहने।”
मां बोलीं– फीस भरना भी मुश्किल होता था
मां रीता यादव की आंखों में खुशी के साथ संघर्ष की यादें भी हैं।
“कई बार छह-छह महीने स्कूल की फीस जमा नहीं कर पाते थे। घर चलाना, तीन बेटियों की जिम्मेदारी और मंगेश की पढ़ाई—सब कुछ बहुत मुश्किल था। लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।”
मां बताती हैं कि मंगेश बचपन से ही क्रिकेट को लेकर जुनूनी था। पढ़ाई से ज्यादा उसका मन मैदान में लगता था।

जीत की रकम नहीं, सम्मान बांटता था
मंगेश के कोच उत्सव बैरागी बताते हैं कि मंगेश बाएं हाथ का गेंदबाज और ऑलराउंडर है। नोएडा जाने से पहले वह रोज बोरगांव से छिंदवाड़ा करीब 70 किलोमीटर आ-जा कर अभ्यास करता था।
कोच कहते हैं—
“जब भी टूर्नामेंट में उसे इनाम मिलता था, वह नकद पुरस्कार ग्राउंड स्टाफ को दे देता था। खुद सिर्फ ट्रॉफी घर ले जाता।”
2022 में सांसद कप में मिली रेसर साइकिल भी उसने ग्राउंड कर्मी को दे दी। उसका मानना था कि मैदान को संभालने वालों की मेहनत सबसे ज्यादा होती है।
संघर्ष से स्टार तक का सफर
मंगेश यादव की कहानी बताती है कि हालात चाहे कितने भी सीमित क्यों न हों, अगर मेहनत और ईमानदारी साथ हों तो मंज़िल दूर नहीं रहती। किराए के छोटे से कमरे से निकलकर IPL के करोड़ों तक पहुंचने वाला यह सफर अब गांव के हर बच्चे के लिए प्रेरणा बन चुका है।
अब सबकी नजरें उस दिन पर टिकी हैं, जब मंगेश भारत की जर्सी में मैदान पर उतरेंगे—क्योंकि उनके पिता के शब्दों में, “असल जीत वही होगी।”