ईरान ने अपनी मुद्रा, रियाल से चार ज़ीरो हटाने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। इसका मुख्य कारण देश में लंबे समय से चली आ रही उच्च मुद्रास्फीति (Inflation) है, जो 35% से अधिक बनी हुई है, जिससे रियाल का मूल्य बेहद कम हो गया है।
इस बदलाव को आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है:
- 10,000 रियाल अब नए सिरे से सिर्फ 1 रियाल के बराबर होगा।
संसदीय मंजूरी मिलने के बाद यह कदम अब कानूनी रूप ले चुका है। यह प्रस्ताव कई सालों से विचाराधीन था।
मौजूदा आर्थिक स्थिति:
मुद्रा के मूल्य में गिरावट इतनी अधिक हो चुकी है कि फ्री मार्केट में एक अमेरिकी डॉलर (1 USD) का मूल्य लगभग 11,50,000 रियाल तक पहुँच गया है। तुलनात्मक रूप से, वर्तमान में एक भारतीय रुपया (1 INR) लगभग 456 रियाल के बराबर है।यह कदम ईरान की सरकार द्वारा राष्ट्रीय मुद्रा को स्थिर करने और दैनिक लेन-देन को आसान बनाने की दिशा में उठाया गया है।

मुद्रा परिवर्तन के मुख्य प्रभाव
1. लेन-देन और हिसाब-किताब में सरलता
सबसे स्पष्ट प्रभाव यह होगा कि लेन-देन करना बहुत आसान हो जाएगा। मुद्रा की इकाइयां छोटी हो जाएंगी, जिससे बड़ी-बड़ी संख्याओं को गिनने, लिखने और बोलने की ज़रूरत खत्म हो जाएगी।
- उदाहरण: जहां पहले किसी वस्तु के लिए आपको 10,00,000 (दस लाख) रियाल चुकाने पड़ते थे, वहीं अब सुधार के बाद उसी वस्तु की कीमत केवल 100 रियाल रह जाएगी।
2. मनोवैज्ञानिक लाभ
छोटी संख्याओं से मुद्रा का मूल्य समझना आम जनता के लिए अधिक सरल हो जाएगा। जब लोगों को छोटे अंक दिखते हैं, तो उन्हें अक्सर लगता है कि उनकी मुद्रा अधिक मजबूत है, जिससे उनकी खरीदारी और वित्तीय योजना बनाने में मानसिक आसानी होती है। हालांकि, यह सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है और अर्थव्यवस्था की मूलभूत समस्याओं को हल नहीं करता।
3. बैंकिंग और तकनीकी सुविधा
यह बदलाव बैंकिंग प्रणालियों, डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म्स और अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के लिए भी सुविधा लाएगा। बड़ी संख्या (जैसे लाखों और अरबों) को संसाधित (process) करने और प्रदर्शित (display) करने में आने वाली तकनीकी जटिलताएं और त्रुटियों की संभावना कम हो जाएगी।
महंगाई पर असर: एक महत्वपूर्ण बिंदु
यह समझना ज़रूरी है कि यह सुधार केवल मुद्रा की इकाइयों को बदलता है, न कि उसका वास्तविक मूल्य।
- रियाल का अवमूल्यन (Devaluation), यानी उसकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम होना, महंगाई के कारण होता है।
- यदि सरकार मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करने के लिए कठोर आर्थिक नीतियां नहीं अपनाती है, तो रियाल का मूल्य कम होता रहेगा और भविष्य में फिर से मुद्रा में सुधार की आवश्यकता पड़ सकती है। यह कदम सिर्फ़ हिसाब-किताब को आसान बनाने के लिए है, न कि महंगाई को सीधे कम करने के लिए।

ईरान की अर्थव्यवस्था 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। देश में लगातार बढ़ रही मुद्रास्फीति और आयात का अधिक तथा निर्यात का कम होना, रियाल के मूल्य में गिरावट का एक प्रमुख आंतरिक कारण रहा है।
रियाल के मूल्य में ऐतिहासिक गिरावट
आर्थिक चुनौतियों के कारण रियाल की कीमत लगातार गिरती गई। वर्ष 2023 में स्थिति इतनी खराब हो गई कि महंगाई की दर ने मुद्रा के अवमूल्यन , यानी सरकार द्वारा जानबूझकर मूल्य कम करने की प्रक्रिया, को भी पीछे छोड़ दिया। इसका मतलब है कि बाजार में रियाल का वास्तविक मूल्य उसकी आधिकारिक कीमत से बहुत तेज़ी से गिर रहा था।
अंतर्राष्ट्रीय पाबंदियां और तनाव
ईरान के दुनिया के साथ तनावपूर्ण व्यापार और संबंध उसकी आर्थिक कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण हैं।
- राजनीतिक अलगाव: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक अलगाव ने देश की अर्थव्यवस्था को और कमजोर किया, जिससे विदेशी मुद्रा की कमी हुई और रियाल का मूल्य और नीचे चला गया।
- अमेरिकी प्रतिबंध (US Sanctions):
- परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा: अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रमों और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं।
- 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति: ट्रम्प प्रशासन ने 'मैक्सिमम प्रेशर' की नीति अपनाई, जिसके तहत तेल निर्यात, बैंकिंग और शिपिंग पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। यहां तक कि ईरानी तेल खरीदने वाली कंपनियों पर भी दंडात्मक कार्रवाई की गई।
व्यापार और अर्थव्यवस्था पर असर
इन पाबंदियों और प्रतिबंधों का ईरान की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है:
- विदेशी मुद्रा की कमी: विदेशी बैंकिंग लेन-देन बेहद मुश्किल हो गए, जिससे डॉलर और यूरो जैसी विदेशी मुद्रा की आवक कम हो गई।
- आयात पर प्रभाव: विदेशी मुद्रा की कमी के कारण आयात महंगा और सीमित हो गया।
निवेश और व्यापार: अंतर्राष्ट्रीय निवेश और व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुए, जिससे आर्थिक विकास रुका।

यहां तक कि, अक्टूबर 2025 तक, संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी ईरान के हथियार कार्यक्रमों पर प्रतिबंधों को और बढ़ा दिया था, जिसने देश की आर्थिक स्थिति को और जटिल बना दिया।
तेल निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर
प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल निर्यात, जो पहले लगभग 1.4-1.7 मिलियन बैरल प्रति दिन था, 2025 तक घटकर लगभग 1 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया।
- राजस्व हानि: इस गिरावट से देश को सालाना $5-10 बिलियन के राजस्व का नुकसान हुआ है।
- व्यापार मार्ग सीमित: ईरान को अब मुख्य रूप से चीन (90% तेल निर्यात चीन को जाता है), तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इराक जैसे देशों के साथ ही व्यापार करना पड़ता है। यूरोप और अमेरिका के साथ व्यापार लगभग समाप्त हो चुका है।
विदेशी मुद्रा की कमी
SWIFT (वैश्विक बैंकिंग प्रणाली) से बहिष्कार और बैंकों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने ईरान के विदेशी मुद्रा भंडार को सीमित कर दिया है।
- उपयोग में बाधा: अनुमान है कि 2025 में विदेशी मुद्रा भंडार $34 बिलियन तक पहुंच सकता है, लेकिन प्रतिबंधों के कारण इस पूंजी का उपयोग आयात और अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन के लिए करना बहुत मुश्किल है।
रियाल का अवमूल्यन और महंगाई
विदेशी मुद्रा की कमी के कारण 2023 से 2025 के बीच रियाल के मूल्य में लगभग 14% की और गिरावट आई है, जबकि महंगाई दर 90% तक पहुंच गई। रियाल से चार ज़ीरो हटाने का हालिया फैसला इसी अत्यधिक महंगाई को देखते हुए लिया गया है ताकि लेन-देन को आसान बनाया जा सके।
आयात और व्यापार घाटा
तेल राजस्व में कमी और प्रतिबंधों ने देश के आयात को बुरी तरह बाधित किया है:
- मानवीय संकट: दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और मशीनरी के आयात में कमी आई है, जिससे न केवल औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हुआ है, बल्कि एक मानवीय संकट भी पैदा हुआ है।
- व्यापार घाटा: 2024 में, ईरान का निर्यात लगभग $22.18 बिलियन (जिसमें तेल और पेट्रोकेमिकल्स प्रमुख थे) था, जबकि आयात $34.65 बिलियन रहा, जिससे $12.47 बिलियन का व्यापार घाटा हुआ। 2025 में यह घाटा बढ़कर $15 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
ईरान के वैकल्पिक आर्थिक प्रयास
व्यापारिक दबाव से निपटने के लिए ईरान ने पड़ोसी देशों और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने की कोशिश की है।
- नई पहल: INSTC कॉरिडोर और चीन के साथ नए ट्रांजिट रूट्स जैसी पहलों पर काम किया जा रहा है।
हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद, 2025 में देश की जीडीपी वृद्धि केवल 0.3% रहने का अनुमान है। यह स्पष्ट है कि प्रतिबंधों के हटने या परमाणु समझौते की बहाली के बिना ईरान के लिए व्यापार को स्थिर करना और रियाल के मूल्य को मजबूत करना एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।

ईरान से पहले, उच्च महंगाई का सामना कर चुके तुर्की सहित कई देशों ने अपनी मुद्रा की इकाइयों को छोटा करने के लिए ज़ीरो हटाने का उपाय अपनाया है:
1. वेनेजुएला (Venezuela)
- कारण: देश में लगातार अत्यधिक मुद्रास्फीति और गहराते राजनीतिक-आर्थिक संकट के कारण वेनेजुएला ने अपनी मुद्रा, बोलिवर (Bolívar), से कई बार शून्य हटाए हैं।
- स्थिति: इन प्रयासों के बावजूद, वेनेजुएला में महंगाई की दर अभी भी बहुत अधिक बनी हुई है, जो दर्शाती है कि केवल ज़ीरो हटाने से आर्थिक समस्याएँ हल नहीं होतीं।
2. तुर्की (Turkey)
- कब: 2005 में, तुर्की ने अपनी पुरानी मुद्रा तुर्की लीरा से छह शून्य हटा दिए और एक नया लीरा ) पेश किया।
- उद्देश्य: इस कदम का मुख्य उद्देश्य दैनिक लेन-देन को आसान बनाना और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी मुद्रा की छवि को बेहतर बनाना था।
3. ब्राजील (Brazil)
- कब: 1990 के दशक में, ब्राजील में अत्यधिक मुद्रास्फीति की स्थिति थी।
- उपाय: इस चुनौती से निपटने के लिए, ब्राजील ने अपनी पिछली मुद्रा क्रूजिएरो को बदलकर नई मुद्रा में शून्य हटाए थे, जो देश की व्यापक आर्थिक सुधार योजना का हिस्सा था।
4. ज़िम्बाब्वे (Zimbabwe)
- कब: 2000 के दशक में, ज़िम्बाब्वे ने चरम मुद्रास्फीति का अनुभव किया, जिससे उसकी राष्ट्रीय मुद्रा, ज़िम्बाब्वे डॉलर का मूल्य व्यावहारिक रूप से शून्य हो गया था।
- स्थिति: इस दौरान, ज़िम्बाब्वे को कई बार अपनी करेंसी से शून्य हटाने पड़े। अंततः, देश को अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए विदेशी मुद्राओं (जैसे अमेरिकी डॉलर) का इस्तेमाल शुरू करना पड़ा।